छठ पर्व की महिमा सूर्य देव की उपासना संतान की खुशहाली और परिवार के कल्याण में निहित है।

उत्तराखंड देहरादून –छठ पर्व की महिमा सूर्य देव की उपासना, संतान की खुशहाली और परिवार के कल्याण में निहित है। यह पर्व प्रकृति की पूजा का एक अनूठा रूप है, जहाँ सूर्य के उगते और डूबते स्वरूप की पूजा की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्य पुत्र कर्ण ने इसकी शुरुआत की थी, और द्रौपदी ने भी मनोकामना पूरी होने के लिए यह व्रत रखा था। इसके अलावा, यह पर्व स्वास्थ्य, धन और समृद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है, और इसमें पवित्रता और अनुशासन का विशेष ध्यान रखा जाता है।

मुख्य महत्व
सूर्यदेव की पूजा
यह सूर्य देव की कृपा और ऊर्जा प्राप्त करने के लिए मनाया जाता है।

संतान की खुशहाली:
इस व्रत का एक मुख्य उद्देश्य संतान के सुखी और दीर्घायु जीवन की कामना करना है।
स्वास्थ्य और समृद्धि: यह त्योहार अच्छे स्वास्थ्य, धन और समृद्धि की प्राप्ति के लिए किया जाता है।
प्रकृति के प्रति सम्मान:
छठ पूजा मूर्ति पूजा के बजाय प्रकृति के तत्वों, विशेष रूप से जल और सूर्य की पूजा पर केंद्रित है।
पवित्रता और अनुशासन:
इस पर्व में व्रतधारी शुद्धता, भक्ति और अनुशासन का पालन करते हैं।

पौराणिक महत्व-
सूर्यपुत्र कर्ण:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्यपुत्र कर्ण छठ पर्व के पहले भक्त थे, जिन्होंने घंटों पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया था। इसी परंपरा का आज भी पालन किया जाता है।
द्रौपदी:
महाभारत काल में, द्रौपदी ने अपने परिवार के लिए छठ का व्रत रखा था, जिससे उनकी मनोकामनाएँ पूरी हुईं और पांडवों को उनका राजपाट वापस मिल गया।
देव माता अदिति:
एक अन्य मान्यता के अनुसार, देव माता अदिति ने छठी मैया की तपस्या की थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें तेजस्वी पुत्र (आदित्य भगवान) प्राप्त हुआ, जिन्होंने देवताओं को असुरों पर विजय दिलाने में मदद की।



