
शहीद मेजर दुर्गा मल्ल : आजादी की वेदी पर हंसते-हंसते प्राण न्योछावर करने वाला डोईवाला का वीर सपूत
भास्कर इंडिया लाइव
देहरादून डोईवाला चमन लाल।
भारत की स्वतंत्रता का इतिहास केवल बड़े नेताओं और प्रसिद्ध आंदोलनों की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन असंख्य वीरों के त्याग, साहस और बलिदान की गाथा भी है, जिन्होंने मातृभूमि की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
उत्तराखंड की धरती ने भी ऐसे अनेक वीर सपूतों को जन्म दिया, जिनमें शहीद मेजर दुर्गा मल्ल का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।
डोईवाला की धरती पर जन्मे मेजर दुर्गा मल्ल ने छोटी उम्र में ही देश की गुलामी के विरुद्ध आवाज बुलंद कर दी थी। वर्ष 1930 में जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश में नमक सत्याग्रह और स्वतंत्रता आंदोलन की लहर उठ रही थी, तब दुर्गा मल्ल नौवीं कक्षा के विद्यार्थी थे। विद्यार्थी जीवन में ही उनके भीतर देशभक्ति की भावना इतनी प्रबल थी कि वे अंग्रेजी शासन के विरोध में सक्रिय रहने लगे।
गोरखा राइफल्स से आजाद हिंद फौज तक
वर्ष 1931 में मात्र 18 वर्ष की आयु में दुर्गा मल्ल 2/1 गोरखा राइफल्स में भर्ती हुए। सैनिक जीवन में रहते हुए भी उनके मन में भारत की स्वतंत्रता की भावना लगातार मजबूत होती रही। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वर्ष 1942 में उन्होंने अंग्रेजी सेना का साथ छोड़कर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली आजाद हिंद फौज (INA) का दामन थामा।
आजाद हिंद फौज में उन्हें गोरखा सैनिकों को संगठित करने और अधिक से अधिक जवानों को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ने की जिम्मेदारी मिली। उनकी निष्ठा, सैन्य दक्षता और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए उन्हें मेजर का पद प्रदान किया गया। इसके बाद उन्हें आजाद हिंद फौज की गुप्तचर शाखा में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई।
दुर्गम पहाड़ियों में जान हथेली पर लेकर मिशन
आजाद हिंद फौज के लिए मेजर दुर्गा मल्ल का सबसे महत्वपूर्ण योगदान उनके खुफिया अभियानों में था। वे अपने साथियों के साथ बर्मा सीमा पार कर तत्कालीन असम और पूर्वोत्तर के दुर्गम इलाकों में पहुंचते थे तथा ब्रिटिश सेना की गतिविधियों की महत्वपूर्ण सूचनाएं आजाद हिंद फौज के मुख्यालय तक पहुंचाते थे।
इन अभियानों इन अभियानों में उनके सामने कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, सीमित संसाधन और हर कदम पर अंग्रेजी सेना द्वारा पकड़े जाने का खतरा रहता था। इसके बावजूद उन्होंने अपने कर्तव्य से कभी पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। संसद के अभिलेख में भी उनके द्वारा रणनीतिक महत्व की सूचनाएं एकत्र कर आजाद हिंद फौज के मुख्यालय तक पहुंचाने का उल्लेख मिलता है।
गिरफ्तारी और मौत की सजा
27 मार्च 1944 को मणिपुर के उखरूल क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण खुफिया अभियान के दौरान मेजर दुर्गा मल्ल अंग्रेजी सेना के हाथों पकड़े गए। इसके बाद उन्हें युद्धबंदी बनाया गया और दिल्ली के लाल किले में उनका सैन्य मुकदमा चलाया गया। उन्हें ब्रिटिश शासन के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई।
अंग्रेजों ने उन्हें बचने का रास्ता भी दिखाया। उनसे आजाद हिंद फौज का साथ छोड़ने और अपने कार्यों के लिए माफी मांगने का दबाव बनाया गया। लेकिन देशभक्ति में डूबे इस वीर ने झुकना स्वीकार नहीं किया।
यह उनके जीवन की सबसे बड़ी वीरगाथाओं में से एक थी—मौत सामने खड़ी थी, लेकिन मेजर दुर्गा मल्ल के कदम मातृभूमि के प्रति अपने संकल्प से नहीं डगमगाए।
पत्नी से अंतिम मुलाकात और अमर संदेश
फांसी से पहले अंग्रेजों ने उनकी पत्नी शारदा देवी को उनके सामने लाकर उन्हें भावनात्मक रूप से तोड़ने का प्रयास किया। लेकिन मेजर दुर्गा मल्ल अपने निर्णय पर अडिग रहे। भारत सरकार के अभिलेख में दर्ज उनके अंतिम संदेश का भाव था कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा और भारत स्वतंत्र होकर रहेगा।
25 अगस्त 1944 को मात्र 31 वर्ष की आयु में मेजर दुर्गा मल्ल को फांसी दे दी गई। उनका शरीर भले ही मिट गया, लेकिन उनका साहस, त्याग और मातृभूमि के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान उन्हें अमर कर गया।
उनकी वीरगाथा की सबसे बड़ी सीख
मेजर दुर्गा मल्ल की वीरगाथा केवल एक सैनिक के बलिदान
की कहानी नहीं है। यह उस अदम्य विश्वास की कहानी है, जिसमें एक युवा सैनिक ने अपने परिवार, सुख-सुविधाओं और जीवन से ऊपर देश की स्वतंत्रता को रखा।
उन्होंने दिखाया कि देशभक्ति केवल हथियार उठाने का नाम नहीं, बल्कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने का नाम है। गिरफ्तारी, यातना, मुकदमा और मृत्यु की सजा—इनमें से कोई भी भय उन्हें अपने राष्ट्रधर्म से विचलित नहीं कर सका।
डोईवाला की धरती के गौरव
मेजर दुर्गा मल्ल का डोईवाला से जुड़ा होना इस क्षेत्र के लिए विशेष गौरव का विषय है। उनकी स्मृति आज भी उत्तराखंड और देशभर में सम्मान के साथ जीवित है। संसद परिसर में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई है, जो स्वतंत्रता संग्राम में गोरखा समाज के योगदान और उनके अद्वितीय बलिदान की याद दिलाती है।
1 जुलाई को उनकी जन्म जयंती पर उन्हें याद करना उनके साहस और देशभक्ति को नमन करना है, वहीं 25 अगस्त को उनका बलिदान दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि देश की आजादी अनगिनत वीरों के त्याग से मिली है।
आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, तब शहीद मेजर दुर्गा मल्ल का जीवन हमें यही संदेश देता है—
“राष्ट्र से बड़ा कोई स्वार्थ नहीं और मातृभूमि के सम्मान से बड़ा कोई धर्म नहीं।”
डोईवाला की इस वीर धरती के अमर सपूत को शत-शत नमन। जय हिंद



